प्रायोजित प्रचार के आधार पर न बनाएं राय : आरएसएस
असम, गुवाहाटी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने असम और सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत के युवाओं से अपील की कि वे आरएसएस के बारे में किसी प्रकार की पूर्वाग्रही धारणाओं या प्रायोजित प्रचार के आधार पर राय न बनाएं। गुवाहाटी के बरबाड़ी स्थित सुदर्शनालय में आयोजित युवा नेतृत्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को संघ को नजदीक से देखना और समझना चाहिए। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए सौ से अधिक युवा प्रतिनिधियों की उपस्थिति में डॉ. भागवत ने संघ के सिद्धांतों, आदर्शों और कार्यपद्धति पर विस्तार से चर्चा की और संगठन के बारे में चल रही बहसों पर भी प्रकाश डाला। अपने दो दिवसीय असम प्रवास के तहत कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज संघ एक व्यापक सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है। लेकिन चर्चाएँ तथ्यों पर आधारित हों। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों और कई डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध आरएसएस संबंधी जानकारी का 50 प्रतिशत हिस्सा या तो गलत होता है या अधूरा। विभिन्न मीडिया संस्थानों में संघ के खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार भी चलाया जाता है। कार्यक्रम की शुरुआत गायक शरत राग द्वारा प्रस्तुत एक देशभक्ति गीत से हुई। इस आयोजन को पूरे पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए संघ को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। डॉ. भागवत ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ का मूल उद्देश्य भारत को विश्वगुरु बनाना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र तभी उठता है, जब समाज उठता है और एक प्रगतिशील भारत के लिए एक संगठित, गुणवान और गुणवत्तापूर्ण समाज का निर्माण आवश्यक है। उन्होंने विकसित देशों के इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता बताई और कहा कि उन देशों ने अपनी पहली सौ वर्षों की यात्रा में समाज को एकजुट और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया। भारतीय समाज को भी इसी प्रकार विकसित होना होगा। संघ के शताब्दी वर्ष पर घोषित पांच सामाजिक परिवर्तन सिद्धांत (पंच परिवर्तन) इसी भावना को व्यक्त करते हैं। सरसंघचालक ने कहा कि भाषा, क्षेत्र और विचारों की विविधताओं का सम्मान करना भारत की प्राचीन परंपरा है। भारत की परंपरा कहती है मेरा मार्ग सही है, लेकिन तुम्हारी परिस्थिति में तुम्हारा मार्ग भी सही हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग भारत से अलग हुए, उनकी विविधताएँ समाप्त होती गईं, जैसे पाकिस्तान में पंजाबी और सिंधी समाज अब उर्दू अपनाने पर विवश हैं। डॉ. भागवत ने कहा कि विविधता का सम्मान करने वाला समाज ही हिंदू समाज है और ऐसा समाज निर्मित करना ही संघ का प्रमुख उद्देश्य है। जब तक भारतीय समाज संगठित और गुणयुक्त नहीं होगा, देश की नियति नहीं बदलेगी। उन्होंने गुरु नानक और श्रीमंत शंकरदेव का स्मरण करते हुए कहा कि इन महान संतों ने विविधता का सम्मान किया और समाज को एकता का संदेश दिया।
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