विस में पेश की जाएगी तिवारी आयोग की रिपोर्ट
असम, गुवाहाटी : असम के 1983 में मोरीगांव के नेली में हुए नरसंहार की जांच को लेकर गठित तिवारी आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा की अध्यक्षता में राजधानी दिसपुर स्थित लोकसेवा भवन में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में इसकी मंजूरी दी गयी। बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य ने 1983 में अभूतपूर्व हिंसात्मक घटनाओं का गवाह बना था। इस घटना की पूरी जांच के लिए 1987 में त्रिभूवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक उसे पेश किया नहीं किया। उनकी सरकार ने महंत के आश्वासन को पूरा करते हुए आगामी विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन रिपोर्ट को पेश करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि नेली में जो नरसंहार हुआ था, जिसमें 2 हजार से अधिक लोग मारे गए थे। लोगों का कहना है कि जनजातीयों ने इस घटना को अंजाम दिया था, लेकिन ऐसी परिस्थिति क्यों आई, जिसके कारण इस तरह की घटना राज्य में हुई। तिवारी आयोग की रिपोर्ट में इसपर विस्तार से विवरण दिया गया है। 600 से अधिक पन्नों वाली रिपोर्ट उस दौरान चार महीने की घटनाक्रम का इतिहास है, जिसमें उस दौरान के सरकारी अधिकारियों के बयान दर्ज है। उन्होंने कहा कि तिवारी आयोग की रिपोर्ट में 1985 से पूर्व असम की परिस्थिति के बारे में विस्तार से विवरण दिया गया है। रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही उस घटना और उस दौरान की परिस्थिति के बारे में जान सकते है। आयोग ने अपने रिपोर्ट में कई अहम जानकारी दी है, जो आज भी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में जनसांख्यिकी दबलाव से लेकर आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के बारे में विस्तार से लिखा है, जो भी प्रासंगिक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आयोग ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि घटना के पूर्व ऐसी कई घटनाएं हुई, जिसने जनजातीय लोगों को उकसाया। जिसके कारण आदिवासियों ने प्रवासी मुसलमानों पर हमला किया। वहीं मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के अन्य प्रांतों की घुसपैठ की समस्या और असम में घुसपैठ की समस्या दोनों अलग-अलग है। असम की स्थिति देश के अन्य प्रांतों से अलग है। राज्य के 12 जिलों में ऐसे लोगों का दबदबा है। राज्य में 1.30 करोड़ ऐसे लोगों की ही आबादी है। उन्होंने कहा कि हमारी चुनौती अलग तरह की है। इसलिए आने वाले 10 सालों तक हमे अलग तरीके से सोच कर लड़ाई जारी रखना होगा।
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