असम, लखीमपुर : असम के लखीमपुर जिले में भी कल बीर लाचित सेना नामक एक संगथन ने असम के पूर्ववर्ती आहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बरफूकन को उनकी जन्मतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वीर सेना के तत्वधान में आज केंद्रीय रूप से यह दिवस मनाया गया। इस मौके पर राष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकार कर्मी एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. दिव्यज्योति सैकिया समेत कई हस्तियों को उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया।
अपने संबोधन में सैकिया ने कहा कि वीर योद्धा को उनके पराक्रम और गौरव के पथप्रदर्शक के साथ ही असम की अनूठी संस्कृति के संरक्षक के रूप में याद किया जाता है। वह समानता, न्याय और सभी के लिए सम्मान के आदर्शों के प्रति समर्पित थे। उन्होंने कहा कि हमें भी वीर योद्धा से प्रेरित होकर आने वाले दिनों में अपने अपने कार्यों के जरिए समाज को आगे ले जाना होगा। गौरतलब है कि विगत दो दशकों से मानवाधिकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में निभाई गई उनकी भूमिकाओं के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई संस्थाओं ने उन्हें पुरस्कारों से नवाजा है।

उल्लेखनीय है कि पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासकों के विजय रथ का पहिया बंगाल से आगे पूर्वोत्तर में नहीं पहुंच सका। मुगल ताकत और पूर्वोत्तर भारत पर फतह के बीच केवल एक शख्स अड़ गया, जिसका नाम है लाचित बरफूकन। आहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित की वीरता की कहानी असम के बच्चे-बच्चे को याद है। आज 24 नवंबर को वीर लाचित का जन्मदिन है। असम के इतिहास और लोकगीतों में लाचित बरफूकन का चरित्र मराठा वीर शिवाजी की तरह अमर है।
17वीं सदी में आहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित ने ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर मुगलों की शक्तिशाली सेना को धूल चटा दी थी। सराईघाट की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध इस युद्ध में लाचित ने शौर्य का ऐसा प्रदर्शन किया कि नैशनल डिफेंस अकैडमी (एनडीए) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को उनके नाम पर पड़े लाचित मैडल से सम्मानित किया जाता है। सन् 1671 में सराईघाट की निर्णायक जंग लड़ी गई। उस वक्त मुगल शासक औरंगजेब पूरे भारत पर साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। रामसिंह प्रथम के नेतृत्व में उसने विशाल मुगल सेना को कामरूप पर अधिकार करने के लिए भेजा।
आहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित ने बेहद कम सैनिकों और संसाधन के साथ युद्ध कौशल का ऐसा प्रदर्शन किया कि मुगल सेना को मुंह की खानी पड़ी। ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर लाचित बोरफूकन के नेतृत्व में औरंगजेब की सेना के परखच्चे उड़ा दिए। गुरिल्ला युद्ध और नदी तथा आसपास के ऊंचाई वाले इलाकों की समझ की बदौलत लाचित ने मुगलों को हरा दिया। फिर इसके बाद कभी असम की तरफ आंख उठाने की राम सिंह की सेना की हिम्मत नहीं हुई। हालांकि लाचित बीमारी को मात नहीं दे सके और 1672 में उनका निधन हो गया।





