असम, हैलाकांडी : असम के हैलाकांडी जिले में किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) ने 16 वर्षीय लड़की से कथित बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में 17 वर्षीय आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। हैलाकांडी पुलिस ने बताया कि बोर्ड के प्रधान मजिस्ट्रेट ने अपराध की गंभीरता, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट, सिलचर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसएमसीएच) की प्रारंभिक रिपोर्ट तथा जांच अधिकारी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह फैसला सुनाया।
यह फैसला 1 अगस्त की रात कटलीचेरा थाना क्षेत्र के अलोईचेरा इलाके में हुई वारदात के दो महीने से अधिक समय बाद आया है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अमिताभ सिन्हा के अनुसार, घटना के वक्त आरोपी की उम्र 17 वर्ष 5 महीने थी और उसे अगस्त के पहले सप्ताह में हिरासत में लिया गया था। इस मामले में कटलीचेरा थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की बलात्कार व हत्या से जुड़ी धाराओं और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस नृशंस घटना के विरोध में बराक घाटी में व्यापक प्रदर्शन हुए थे और लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-6 को जाम कर दोषियों को मृत्युदंड देने की मांग की थी।
मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने फॉरेंसिक साक्ष्यों, चिकित्सीय साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर सितंबर में किशोर सहित पांचों आरोपियों के खिलाफ अदालत में विस्तृत आरोप पत्र दाखिल किया था। किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 के तहत 16 से 18 वर्ष की आयु के आरोपी पर जघन्य अपराध का मामला होने पर उसकी मानसिक व शारीरिक क्षमता और अपराध की परिस्थितियों का आकलन करने के लिए प्रारंभिक मूल्यांकन किया जाता है, ताकि यह तय हो सके कि मामला वयस्क अदालत में भेजा जाए या नहीं।
हैलाकांडी बोर्ड के इस आदेश पर कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है। वरिष्ठ अधिवक्ता गौतम घोष ने घटना की बर्बरता को देखते हुए निर्णय का स्वागत किया और कहा कि अदालत ने केवल उम्र को आधार न बनाकर अपराध की गंभीरता को प्राथमिकता दी है। इसके विपरीत, गौहाटी उच्च न्यायालय की वकील व मानवाधिकार कार्यकर्ता तानिया लश्कर ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता मात्र से किसी नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाना उचित नहीं है और इसे उच्च अदालत में चुनौती दी जा सकती है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन का हवाला देते हुए मीडिया कवरेज या जनआक्रोश के प्रभाव से बचकर केवल साक्ष्यों के आधार पर न्याय करने पर जोर दिया।
दूसरी तरफ उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता मिलन लश्कर ने स्पष्ट किया कि भारत में यह कोई अनोखा फैसला नहीं है और गंभीर अपराधों में 18 वर्ष से कम उम्र के आरोपियों पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाए जाने के कई उदाहरण मौजूद हैं। इस बीच, पीड़िता के परिवार ने बोर्ड के निर्णय का स्वागत करते हुए अदालत का आभार व्यक्त किया है और उम्मीद जताई है कि अपराध में शामिल सभी दोषियों को कठोरतम कानूनी सजा मिलेगी।






