नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने एक बेहद सख्त टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि यदि कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के मूलभूत सिद्धांतों के बावजूद महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने जैसी अमानवीय कुप्रथाएं जारी रहती हैं, तो एक संवैधानिक लोकतंत्र का अस्तित्व कायम नहीं रह सकता। शीर्ष अदालत ने यह दूरगामी फैसला ओडिशा में वर्ष 1998 में घटे एक बर्बर मामले में आरोपी बलकू राम की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए सुनाया। इस घटना में दोषी ने अपने साथी के साथ मिलकर एक लाचार महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला और उस पर अंधविश्वास के तहत डायन होने का झूठा आरोप लगाते हुए डंडों से इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इस पूरी दर्दनाक घटना की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी मृतक महिला की अपनी बेटी ही थी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने दोषी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि घटना के तथ्यों ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हमारा भारतीय संविधान एक ऐसे प्रगतिशील समाज की नींव रखता है जो समानता, आपसी बंधुत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हो, जिसमें महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली किसी भी कुरीति के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं है। शीर्ष अदालत ने बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के ऐतिहासिक विचारों का स्मरण कराते हुए कहा कि एक सच्चा और न्यायपूर्ण समाज वही कहलाता है जहां एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव निरंतर बढ़े और तिरस्कार या घृणा की भावना का पूरी तरह अंत हो।
अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता व्यक्त की कि कड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में डायन-हंटिंग जैसी कुप्रथाएं आज भी जीवित हैं, जहां अंधविश्वास और अतार्किक डर कानून के शासन पर हावी हो जाता है। पीठ ने कहा कि जब समाज में तर्कहीनता हावी होती है, तो महिलाएं ही सबसे पहले ऐसी घृणा और हिंसा का शिकार बनती हैं। निचली अदालत और ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसलों की पुष्टि करते हुए शीर्ष अदालत ने उम्मीद जताई कि यह फैसला अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ न्याय की जीत का एक कड़ा संदेश साबित होगा।
वहीं दूसरी ओर, उच्चतम न्यायालय की इस ऐतिहासिक टिप्पणी का देश के प्रमुख अंधविश्वास विरोधी नेता और असम के राष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. दिव्यज्योति सैकिया ने सहर्ष स्वागत किया है। उल्लेखनीय है कि डॉ. सैकिया ने असम में अंधविश्वास और डायन-हंटिंग जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लंबा संघर्ष किया है और राज्य में ‘द असम विच हंटिंग (प्रोटेक्शन, प्रिवेंशन एंड प्रॉसिक्यूशन) एक्ट 2015’ जैसा कड़ा कानून लागू करवाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। शीर्ष अदालत के इस रुख को उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ जारी देशव्यापी सामाजिक लड़ाई के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन और मील का पत्थर करार दिया है।






