मेघालय, पश्चिम खासी हिल्स : मेघालय हाई कोर्ट ने पश्चिम खासी हिल्स में साल 2016 में एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में तीन दोषियों की सजा और 10-10 साल की कैद को बरकरार रखा है। कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए इन तीनों व्यक्तियों की आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहित डेरे और न्यायमूर्ति डब्ल्यू. दीेंगदोह की खंडपीठ ने क्लेवरस्ट्रेन मारनगार, प्रोनिंगस्टार मारनगार और बासनेस रिनताथियांग द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए फैसला सुनाया कि निचली अदालत ने इन्हें बिल्कुल सही दोषी ठहराया था और इस सजा में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
यह पूरा मामला सितंबर 2016 का है जब नोंगस्टोइन पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पीड़िता की मां ने आरोप लगाया था कि 11 सितंबर 2016 को छह लोगों ने उनकी 15 साल की बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था। पुलिस जांच के दौरान आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से तीन आरोपी नाबालिग पाए गए और उन पर किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) के समक्ष अलग से मुकदमा चलाया गया। बाकी बचे पांच आरोपियों को विशेष पोक्सो अदालत ने दोषी ठहराया था, जिनमें से केवल तीन ने ही निचली अदालत के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अपीलकर्ताओं ने कोर्ट में दलील दी थी कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ मामले को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है। इसके साथ ही उन्होंने पीड़िता द्वारा की गई आरोपियों की पहचान पर सवाल उठाए, साक्ष्यों में विरोधाभास होने की बात कही और तर्क दिया कि मुकदमे के दौरान आरोपों में बदलाव किए जाने से उनके बचाव के अधिकार को नुकसान पहुंचा है। हालांकि हाई कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने पोक्सो कानून के तहत आवश्यक सभी बुनियादी तथ्यों को मजबूती से स्थापित किया है।
अदालत ने पीड़िता के बयान को पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय माना और कहा कि जिरह के दौरान ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया जिससे उसकी गवाही पर शक किया जा सके। इसके अलावा, पीड़िता के बयान की पुष्टि उसकी सहेली, परिवार के सदस्यों, मेडिकल रिपोर्ट और टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) से भी हुई। मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर हाल ही में हुए यौन हमले और शारीरिक चोटों के निशान मिले थे। पीड़िता ने शिनाख्त परेड के दौरान एक सह-आरोपी को छोड़कर बाकी सभी आरोपियों की सही पहचान की थी, जिस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही शिनाख्त परेड अंतिम सबूत न हो, लेकिन इसका सहायक साक्ष्य के रूप में बहुत बड़ा महत्व है।
बचाव पक्ष ने इस बात पर भी आपत्ति जताई थी कि मुकदमे के दौरान आरोप बदले जाने के बाद पीड़िता का जन्म प्रमाण पत्र कोर्ट में पेश किया गया था। इस पर खंडपीठ ने कहा कि उस दस्तावेज को किसी ने चुनौती नहीं दी थी और चूंकि पीड़िता की उम्र को लेकर कोई विवाद ही नहीं था, इसलिए इसे पेश किए जाने के समय से कोई फर्क नहीं पड़ता। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है और दोषी पोक्सो कानून के तहत मिलने वाली वैधानिक धारणाओं को गलत साबित करने में नाकाम रहे हैं, जिसके बाद हाई कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज कर निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा।





