असम, गुवाहाटी : असम के प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रखर प्रेरणादायक वक्ता डॉ. दिव्यज्योति सैकिया ने लद्दाख के अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे सोनम वांगचुक के ऐतिहासिक और शांतिपूर्ण संघर्ष का पूर्ण समर्थन किया है। डॉ. सैकिया ने कहा कि लद्दाख की बर्फीली वादियों से उठ रही वांगचुक की आवाज़ सिर्फ एक क्षेत्र विशेष की मांग नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा, पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों को बचाने की एक वैश्विक पुकार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सोनम वांगचुक आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए प्रकृति और मानवाधिकारों की रक्षा का मोर्चा संभाले हुए हैं।
डॉ. सैकिया के अनुसार, जब विकास के नाम पर प्रकृति का अत्यधिक दोहन होने लगे और स्थानीय समुदायों की आवाज़ को अनसुना कर दिया जाए, तब वांगचुक जैसे दूरदर्शी राष्ट्रनायक ही समाज को सही दिशा दिखाते हैं। उन्होंने असम और पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में बात करते हुए कहा कि वहां के नागरिक होने के नाते वे पर्यावरण के संकट और अपनी अनूठी संस्कृति को खोने के डर को बखूबी समझते हैं, इसलिए लद्दाख का यह दर्द उनका अपना दर्द है।
लोकतंत्र की मूल भावना का हवाला देते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि लोकतंत्र की असली खूबसूरती इस बात में है कि आखिरी कतार में खड़े व्यक्ति की आवाज़ भी सुनी जाए। गांधीवादी तरीके से अपनी बात रख रहे एक महान अन्वेषक और देशभक्त की मांगों पर ध्यान न देना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है। उन्होंने सरकार और देश के नीति-निर्माताओं से अपील की है कि वे लद्दाख के लोगों की जायज मांगों और छठी अनुसूची के तहत उनके अधिकारों के संरक्षण पर संवेदनशीलता से विचार करें। डॉ. सैकिया ने दावा किया कि आज पूरा असम और देश का हर जागरूक नागरिक सोनम वांगचुक के इस अहिंसक आंदोलन के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है और यह समय चुप रहने का नहीं, बल्कि पर्यावरण, मानवाधिकार और न्याय के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करने का है।





